आम की जैविक खेती:

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आम हमारे देश में सबसे अधिक उगाये जाने वाले फलो में से एक है। आम को फलों का राजा भी कहा जाता है।

आम पुरी दुनिया भर में बड़े चाव से खाया जाने वाला फल है, ओर इसकी खपत भी बहुत ज्यादा है। भारत के आमो की मांग पूरे विश्व है लगातार बानी रहती है।


कई आमों का स्वाद, आकार और बीज का आकार भिन्न-भिन्न होता है ओर ये उनकी किस्मो पर निर्भर करता है।

आम की उन्नत किस्में का विवरण:

आम के किस्मों की बात करे तो कुछ प्रमुख किस्मे: दशहरी, केसर, मल्लिका, लंगड़ा बनारसी, आम्रपाली, सुंदरजा, चौसा और अल्फोंसो हैं। जैविक खेती के द्वार पैदा किये गये आम उर्वरक के इस्तेमाल के द्वारा पैदा किये गये आमो से कही अधिक स्वादिष्ट, बेहतर क़्वालिटी ओर पोषक तत्वों से परिपूर्ण होते है।

आम खाने के लाभ:

आम स्वास्थ्य के लीये बहुत लाभकारी होता है। आम खाने से कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित किया जा सकता है, इससे कैंसर से बचाव होता है तथा त्वचा को साफ करने में भी मदतगार होता है।

आम की जैविक खेती क्या होती है?

आम की जैविक (organic) खेती एक तरह की प्राकर्तिक खेती होती है, जिसमें हम प्रकृति में उपलब्ध पदार्थों का इस्तेमाल करते है।

आम की जैविक खेती सस्ती खेती भी मानी जाती है क्यों कि इस खेती में हम कीटनाशक, उर्वरक, तथा सिंथेटिक उर्वकों का प्रयोग नही करते है। इस तरह की आम की जैविक खेती को अपना कर हम खर्चो में काफी कमी कर सकते है।


चूंकि यह एक जैविक खेती है तो इस खेती के द्वारा प्राप्त फलो मैं उच्च पौष्टिक तत्व मौजूद होते है, ओर ये स्वाद मैं भी बहुत अच्छे होते है। आम की जैविक खेती करने का अहम मकसद कीटनाशक ओर यूरिया मुक्त फल उगाना है

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आम की जैविक खेती करने के फायदे:

● जैसे-जैसे लोग जैविक खेती के द्वारा उगाये गये फलो की खूबियों को जान रहे है वैसे-वैसे मार्किट में जैविक फलो की मांग भी बढ़ती जा रही है।

● आम की जैविक खेती को अपना कर आप हानिकारक उर्वरक तथा रसायनों को खरीदने से भी बच रहे है, जो काफी महँगे होने के साथ-साथ आप के स्वास्थ्य को भी हानि पहुँचा रहे है।


● जैविक खेती के द्वारा उगाये गये फलो का दाम भी उर्वरकों के द्वारा उगाये गये फलो से काफी ज्यादा मिलता है।


● जैविक विधि से उगाये गये फलो को बेचने में किसानों को कोई दिक्कत भी नही आती है। ज्यादातर लोग आम को उनके बागों से ही खरीद के ले जाते है।


● जैविक विधि से उगाये गये फलो की लागत भी कम होती है तथा ये वातावरण को कोई नुकसान भी नही पहुचाते है।

जैविक आम की खेती की शुरुआत कैसे करें ?

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आम की जैविक खेती की सुरूआत हम उसके पौधे को बड़े करने से सुरु कर सकते है। पौधों को बड़े करने से लेकर उसके फल देने तक हम उसका प्रबंधन जैविक प्रणाली से करते है।

जैविक प्रणाली में हम पौधों की खरपतवार से लेकर उसके पोषक तत्वों का प्रबंधन करते है। हम कीटनाशक, उर्वरक, तथा सिंथेटिक उर्वकों का प्रयोग नही करते।

परम्परागत खेती के सिस्टम को बदल कर ही हम जैविक खेती को बढ़ावा दे सकते है। जैविक खेती को अपनाने के लिये हमको नई नीतियों को भी अपनाना होगा।

हमें उर्वरकों तथा सिंथेटिक रसायनों के उपयोग से बचना होगा। आज कई किसान ऐसे है जिन्होंने जैविक (organic) खेती को अपनाया है। 

जैविक आम की खेती की सुरूआत आप छोटे स्तर से भी कर सकते है। ऐसा करने से जोखिम भी कम होता है तथा सीखने को भी बहुत कुछ मिलता है।

छोटे स्तर से सुरूआत करने से आप अपने बागों का मैनेजमेंट भी अच्छे तरीके से कर सकते हों और अगर कोई समस्या आ जाये तो उसका निस्तारण भी अच्छे से कर सकते हो।

जैसे-जैसे आप अनुभव और ज्ञान प्राप्त करते जायेंगे वैसे-वैसे ही आप अपने बागों का विस्तार कर सकते है और बड़े स्तर पर आम की जैविक खेती कर सकते है।

जैविक खेती में मिट्टी की गुणवत्ता :

● आम की जैविक खेती में मिट्टी की सेहत बहुत अहम होती हैं।
● मिट्टी की सेहत हो बढ़ाने के लिये जैविक संसाधनों का इस्तेमाल करते है।
● आम की जैविक खेती में प्रबंधन का बहुत अहम रोल होता है। हमें प्रबंधन पर भी ध्यान देना चाहिए।
इस तरह के मैनेजमेंट को अपना कर हम आम की जैविक खेती को बड़े आराम से कर सकते है और उच्च गुडवत्ता के फल को प्राप्त कर सकते है।

आम की खेती के लिए जलवायु और भूमि का चयन:

आम की जैविक खेती उष्ण एव समशीतोष्ण दोनों प्रकार की जलवायु में कर सकते है। आम की जैविक खेती के लिए 23 से 27 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान उचित माना जाता है।

आम की जैविक खेती के लिये ऐसी मिट्टी का चुनाव करना सही होता है जिसमें जैविक पदार्थों की मात्रा ज्यादा हो तथा सूक्ष्म पोषक तत्व भरपूर मात्रा में हो तथा कार्बनिक पदार्थों से भरपूर हो।

अगर मिट्टी का PH 7.6 से अधिक है तो ऐसी मिट्टी में आम की जैविक खेती नही करनी चाहिये। आम की जैविक खेती जलोढ़ मिट्टी से लेकर लेटेरिटिक तक सभी प्रकार की मिट्टी में अच्छी तरह से कर सकते है।

इसके अलावा लाल दोमट मिट्टी भी आम की जैविक खेती के लिये अच्छी मानी जाती है। काली मिट्टी में आम की खेती नही करनी चाहिये क्योंकि इसमें पोषण तत्वों की कमी होती है।

आम की खेती के लिये जगह का चुनाव निम्न बातो को ध्यान में रख कर करना चाहिए जैसे:

● जिस जगह का चुनाव कर रहे है उस जगह खरपतवार, किसी प्रकार की बीमारी या कीटो का प्रकोप ना हो। ऐसा होने पे आप की फसल प्रभवित हो सकती है।

● जिस मिट्टी का उपयोग आप आम की खेती के लिये कर रहे है उसमें भारी धातू या भारी धातु के अवशेष कार्बनिक मानकों द्वारा निर्धारित सीमा से अधिक नहीं होने चाहिए।

● आम की खेती के लिये उपजाऊ भूमि का चयन करना चाहिये। बंजर या ऊसर की जमीन पे आम की खेती नही करनी चाहिये।

● ऐसी जगह का चुनाव नही करना चाहिये जहाँ अंधी या तूफान आने की समस्या हो।

● चिकनी बलुई मिट्टी आम की खेती के लिये अनुकूल होती है क्यों कि इसमें पोषक तत्वों की भरपूर मात्रा होती है तथा पानी की आवश्यकता भी कम होती है। चिकनी बलुई मिट्टी जैविक पदार्थ को अच्छे से अवशोषित कर सकती है, जो जैविक आमो के अच्छे उत्पादन के लिए उपयुक्त होती है।

आम के पेड़ लगाने का तरीका:

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आम की अच्छी पैदावार लेने के लिये आम के पेड़ लगाने का तरीका तथा पेड़ लगाने की जगह तथा एक पेड़ से दूसरे पेड़ की बीच की दूरी का ज्ञान होना बहुत जरूरी होता है।

एक पेड़ से दूसरे पेड़ के बीच की दूरी आप के आम के फलो की पैदावार को प्रभावित कर सकते है। आम के पेड़ों से पेड़ों के बीच की दूरी आम की प्रजाति तथा लगाने की जगह पे निर्भर करता है।

गड्ढों को तैयार करते समय ध्यान देने योग्य बातें:


ऐसी जगह जहाँ बारिश कम होती है वैसी जगहों पर आम के पेड़ों को एक दूसरे से 30 ft से 32 ft की दूरी पर लगाना चाहिए।

ऐसी जगह जहाँ बारिश बहुत ज्यादा होती है और जमीन की गुडवत्ता भी अच्छी हो वैसी जगह आम के पेड़ों से पेड़ों के बीच की दूरी 40 ft से 42 ft होनी चाहिये।


पेड लगाने के लिये गड्ढा बरसात आने से पहले ही खोद लेना चाहिए ताकि बरसात में होने पे पानी इन गड्ढो में भर जाये और जमीन मैं अच्छी नमी बन जाये जो पौधों को बढ़ने में मदत करता है।

गड्ढो का आकार 3 ft लंबा 3 ft चौड़ा ओर 3 ft गहरा होना चाहिये। इन गड्ढो का आकार आम की किस्मो तथा मिट्टी की गुडवत्ता के आधार पर अलग-अलग हो सकता है।

आम की खेती में उपयोग होने वाले जैविक उर्वरक:

  • प्राकृतिक खनिज भण्डार जैसे हाइड्रेटेड लाइम, इमस्टोन पाउडर, गुआनो, मैग्नीशियम ऑक्साइड या लौह आदि का उपयोग कर सकते है। पौधे अपना पोषण मिटटी मैं मौजूद कार्बनिक और खनिज स्रोतों से प्राप्त करते हैं।

 

  • फोलिक जैविक उर्वरक जो हमें फलो तथा मछली के अमीनो एसिड से प्राप्त होता हैं।

 

  • जानवरो के अपशिष्ट ( गोबर इत्यादि ) को पौधों के अवशेषों ( पत्ते ,खराब फल इत्यादि ) के साथ मिला कर सड़ाया जाता है, ओर कुछ दिनों बाद वो खाद (वर्मी कंपोस्ट) का रूप ले लेती है जिसमें सूक्ष्मजीवों की भरमार होती है जो पौधों के स्वास्थ्य के लिये बहुत अच्छा होता है।

 

  •  तरल कार्बनिक अपशिष्ट पदार्थ जो खाद्य पोषक तत्वों से भरपूर होता है और इसमें फायदेमंद सूक्ष्मजीवों की भरमार होती है।

पौधों की देखभाल:

पौधों-की-देखभाल

आम के पेडों का आकार नियंत्रित करने और फलो के आकार तथा रंग में सुधार करने के लिये पेड़ो की छटाई करना बहुत महत्वपूर्ण है। शाखाओं की छंटाई तीन साल में एक बार अगस्त-सितंबर के दौरान की जा सकती है। 

आम के पेड़ों की काट-छाट अच्छी ताजी हवा और पर्याप्त रोशनी के लिये भी बहुत जरूरी होता है। आम के पेड़ों की काट-छाट करने से पेड़ तथा फल दोनों रोगों से बचे रहते है।

छंटाई के द्वारा सुख चुकी टहनियों को भी समय रहते हटा दिया जाता है जिससे पेड़ स्टेम-एंड रोट जैसी बीमारियों से भी बच जाता है।

जरूरत से ज्यादा झूलती हुई टहनियां जो जमीन को छू रही हो और जो एक दूसरे के ऊपर लटकी हो और जो टहनियां कमजोर होती है उनको तोड़ के हटा देना चाहिये जिससे प्रकाश और अच्छी हवा प्राप्त हो सके।

जैविक तरीके से आम के कीटों और रोगों का नियंत्रण :

जैविक आम के उत्पादन में सिंथेटिक कीटनाशक और कवकनाशी की अनुमति नहीं होती है। आम की जैविक खेती के लिये कीटों और रोगों के प्रबंधन में एकीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है।

एकीकृत दृष्टिकोण को अपना कर ही हम होने वाली समस्याओं को समय रहते निपटा सकते है। आप ठान ले कि आप को बस जैविक तरीके से ही खेती करनी है और रसायनों तथा उर्वकों का इस्तेमाल बिल्कुल नही करना है।

जैविक तरीके से कीटों पर नियंत्रण :

जो कीट मुख्य रूप से आम के पेड़ों ओर फलो को नुकसान पहुचाता है उनमें मुख्यतः माइलबग, लीफहॉपर, कैटरपिलर ओर फल मक्खी है।

माइलबग: 

माइलबग के प्रकपो से पेड़ो की पत्तियां पीली पड़ जाती है और विकृत हो जाती है जिनमें पत्तियों का मुड़ जाना या रोल हो जाना आदि है।

माइलबग आमतौर पर पत्तियों का रस चूसता है और बहुत कम समय में अपनी जनसंख्या बढ़ता है। माइलबग दिखने में सफेद फफूंदी जैसा होता है।

जिस पेड़ की पत्तियां इस माइलबग से प्रभावित होती है उन प्रभावित पत्तियों को तोड़ के बाग से दूर मिट्टी में गाड़ देना चाहिये तथा पेड़ो के ऊपर साबुन ओर मिर्ची मिला पानी का छिड़काव करना चाहिये। ऐसा करने से हम माइलबग पे नियंत्रण कर सकते है।

लीफहॉपर:

लीफहॉपर पौधों के फूलों, पौधों की पत्तियों, तथा नये आये फलो पे पाये जाते है तथा इन्ही से अपना आहार ग्रहण करते है।

ये फूलो, पत्तो तथा फलो के तरल पदार्थ को चूसते हुऐ बड़े होते है। अगर पेड़ो के पत्ते, फूलों तथा फलो पे आप को कोई काला धब्बा दिखे तो समझ जाइये की ये लीफहॉपर की वजह से हुआ है।

इस कीट को नियंत्रित करने के लिऐ लहसुन के तेल और नीम के तेल का छिड़काव करने की सलाह दी जाती है। 

कैटरपिलर:

कैटरपिलर का लार्वा छोटे आम के पौधों ओर नर्सरी में तैयार होते हुए पौधों को ज्यादा प्रभावित करता है।

कभी-कभी ये भी देखने को आया है कि कैटरपिलर आम के फलो को भी प्रभावित करता है।

इस से बचने के लिये अदरक, लहसुन तथा मिर्ची का अर्क तथा नीम का अर्क का इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है तथा ज्यादा प्रभावित पौधों को तोड़ के कही दूर मिट्टी मे दबा देना चाहिये या जला देने की सलाह दी जाती है।

फल मक्खी:

फल मक्खी आम के फलो को बहुत नुकसान पहुचती है। फल मक्खी चाहे वयस्क हो या लार्वा मैगॉट्स ये दोनों रूपो में आम के फलो के लिये नुकसानदायक होती है।

फल मक्खी से फलो को बचाने के लिये हमे फलो को पेड़ पे पकने से पहले ही तोड़ लेना चाहिये, अर्थात जब फल अपना सही आकार ले ले और पकने को तैयार हो तभी फलो को तोड़ लेना चाहिये।

पके हुए फलो पे फल मक्खी का हमला हमेशा बना रहता है ओर कच्चे फलो पे फल मक्खी का हमला नही के बराबर होता है।

महत्त्वपूर्ण: पके हुऐ फलो ओर नीचे गिरे हुऐ फलो को समय से बागों से निकल देने चाहिए और बागों को समय-समय पे स्वच्छ करते रहना चाहिये। ऐसा करने से हम फल मक्खी के प्रकोप से बच सकते है।

फलो को कीटो से बचाने के लिये जैविक तरीको से कीटनाशक स्प्रे को तैयार करना:

 

फलो को कीटो से बचाने के लिये दो तरीकों से स्प्रे को तैयार कर सकते है:

1.) जैविक कीटनाशक स्प्रे को तैयार करने के लिऐ गोमूत्र, अरंडी का तेल, नीम, तथा एवेटेरिया नेरिफ़ोलिया ( एक विषैला पौधा) का इस्तेमाल किया जाता है। इन सबको मिला के स्प्रे तैयार किया जाता है जो बहुत कारगर होता है।

2.) मैंगो लीफहॉपर, माइलबग्स इत्यादि जैसे कठोर कीटों को नियंत्रित करने के लिए बिछुआ पत्ती के अर्क का छिड़काव किया जाता है।

बिछुआ पत्ती के अर्क को बनाने के लिये बिछुआ पत्ती पाउडर की 300 ग्राम मात्रा को 6-7 लीटर पानी में 24 घंटे के लिए भिगो कर तैयार किया जाता है।

अर्क को छान लें और इस अर्क में 25 लीटर गोमूत्र मिलाएं। कीटों को नियंत्रित करने के लिए 250 लीटर पानी में घोल दें और पत्तियों पर स्प्रे करें।

जैविक तरीके से रोगों पर नियंत्रण :

आम के पेड़ों मैं लगने वाले रोग हैं: पाउडरी फफूंदी, तना तथा जड़ो के रोग और एन्थ्रेक्नोज। इस रोगों से बचने के उपाय इस प्रकार हैं:

पाउडरी फफूंदी (Powdery mildew) :

औइडियम मैजिफेरा (Oidium mangiferae) पादप रोगज़नक़ है जिसके कारण आम के पेड़ों पर पाउडर फफूंदी रोग हो जाता है।

ये रोग बहुत खतरनाक होता है इसके कारण पूरी फसल खराब हो जाती है। हॉर्सेटेल या कैस्यूअरीना अर्क का छिड़काव रोग को नियंत्रित करने में मदद करता है।

तना तथा जड़ो के रोग:

तना तथा जड़ो में रोग तभी लगते है जब हम बागों का प्रबंधन अच्छे से नही करते है। समय-समय पे बागों के सूखे पत्तों ओर लकड़ियों को हटाते रहना चाहिये और पेड़ो के पोषण का अच्छे से ख्याल रखना चाहिये।

मिट्टी की गुडवत्ता का भी ध्यान देना चाहिये। ये सब प्रबंधन कर के हम तनो तथा जड़ो में होने वाले रोगों को नियंत्रित कर सकते है।

पेड़ो में फूल आने से पहले कम दर से (2-3 किलो) प्रति पेड़ जिप्सम के रुप में मिट्टी में कैल्शियम के उपयोग की सलाह दी जाती है।

किसान रोग को नियंत्रित करने के लिए व्यावसायिक रूप से उपलब्ध जैव कीटनाशकों जैसे वर्टिसिलियम लेकेनी ओर स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस स्प्रे का इस्तेमाल भी कर सकते है।

एन्थ्रेक्नोज:

एन्थ्रेक्नोज भी एक तरह का फफूंदी रोग होता है। एन्थ्रेक्नोज रोज मुख्यतः ज्यादा बारिश और उमस (humid) वाली जगह होता है।

इस रोग से बचने के लिये बागों की अच्छे से साफ सफाई करनी चाहिये और सड़ी-गली पत्तियां ओर फल को बाग से हटा देना चाहिये। पेड़ो को जरूरी पोषक तत्व तथा मिट्टी की गुडवत्ता का भी ध्यान देते रहना चाहिये।


पोटैशियम बाईकार्बोनेट का छिड़काव कर के हम एन्थ्रेक्नोज रोग को नियंत्रित कर सकते है।

आम के फलो की तुडाई:

 

जब आम के फलो का रंग गाढ़े हरे से हल्के हरे रंग में बदलने लगे तो समझ जाना चाहिये कि हमारा आम अब तोड़ने के लिये तैयार हो गया है।

आम को तैयार होने में 3 से 4 महीने का समय लगता है पर कभी-कभी कम या ज्यादा समय भी लग सकता है जो उस क्षेत्र के मौसम पे निर्भर करता है।

आम के फलों को तोड़ने का समय:

आम को तोड़ने का सबसे सही समय सुबह का होता है ओर तोड़े हुऐ आमो को गत्ते या लकड़ी की पेटियों में रख कर उस पेटी को किसी छाया वाली जगह पे रखना चाहिये।

बाजार में आम को भेजने से पहले आमों को उसकी क्वालिटी तथा उसके आकर के आधार पे अलग-अलग कर के पैक करना चाहिये।

ऐसे करने से खरीदार को जिस क्वालिटी का आम चाहिये होता है वो उस क्वालिटी का आम आसानी से खरीद लेता है।

आम की उपज:

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आम की उपज उसके प्रबंधन पर निर्भर करती है। अगर सही से प्रबंधन किया जाये तो एक पेड़ से काम से काम 160 से 220 किलोग्राम तक की पैदावार ली जा सकती है। आम की पैदावार आम की किस्मो पर भी निर्भर करती है।

आम को तोड़ने के बाद कि प्रक्रिया:

आम को तोड़ने के बाद इसको पकाने के लिये किसी कैमिकल को लगाने से बचना चाहिये। हमको ये सुनिश्चित करना होगा कि हमारा आम बाग मैं पकने से लेकर खाने तक केमिकल फ्री हो।

आम की पैकिंग वाली जगह साफ-सुथरी हो और जो आम पैक हो रहा है वो भी साफ हो उसमें कही कोई दाग या धब्बा या फफूंदी ना लगी हो।

खराब आम को कभी पेटी में साफ आमो के बीच में नही रखना चाहिये नही तो ये आम सभी आमो को खराब कर देगा।

आम का भण्डारण :

अगर आम को ज्यादा समय के लिये स्टोर करना है या आम को कही दूर भेजना है तो आम को कुछ पोस्ट हार्वेट उपचार की जरूरत होती है ताकि हमारा आम खराब न हो ओर उसमें फँगी ना लगे।

अगर आम को कम समय के लिये स्टोर करना है तो उसको उपचार की कोई जरूरत नही होती है।

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SUNIL YADAV
I was born into a farmer's family in a village near Banaras. I completed my studies in mechanical engineering and I am the first engineer in my village. Since childhood, I have been more attracted to nature and wanted to do something that would keep me connected to farms and farmers. I love to do research and collect the latest information about agriculture, horticulture and then I write articles about them. If my farmer brothers benefit even a little from the articles I write, I will consider myself very lucky.

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