मशरूम-में-लगने-वाले-रोग-उनकी -पहचान-व-उनका-नियंत्रण

मशरूम-में-लगने-वाले-रोग-उनकी -पहचान-व-उनका-नियंत्रण

मशरूम के रोग, उनकी पहचान तथा मशरूम रोग रोकथाम :

मशरुम की खेती चाहे हम झोपडी में करे या फिर नियंत्रित वातावरण में दोनों ही अवस्था में इसमें अनेक प्रकार की बीमारियों व कीड़ों का प्रकोप हमेशा बना रहता है। मशरूम की सभी समस्यायें मुख्यतः दो भागों में बांटी जा सकती है:-
1. अजैविक
2. जैविक

1. अजैविक:

यदि कमरे में तापमान , नमी , पानी का छिड़काव , हवा आदि यदि सही न हो तो भी कई तरह की समस्यायें पैदा कर देते हैं ।

इससे मशरूम पैदावार में कमी आ सकती है व कई बार उत्पादित मशरूम की गुणवता कम हो जाती है ।

उदाहरण के तौर पर यदि मशरूम उत्पादन के समय कमरे में हवा की कमी होगी तो मशरूम के तने बड़े हो जायेंगे जिससे उसकी गुणवत्ता पर प्रतिकूल असर पड़ेगा ये अजैविक कारण हैं ।

2. जैविक:

जैविक रोग में जीवाणु , वीषाणु व कीड़े – मकोड़े मशरूम में समस्या पैदा करते हैं इनमें मुख्यतः फफूंद , जीवाणु ( बैक्टिरिया ) , वीषाणु ( वायरस ) , कीड़े – मकौड़े व सुत्रकृमि प्रमुख हैं । मशरूम की बीमारियों व कीड़े मकौड़ों से न केवल मशरूम का उत्पादन कम होता है बल्कि उत्पादित मशरूम की गुणवत्ता तथा विक्रय मूल्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है , ये जैविक कारण हैं ।

मशरूम में बीमारी गलत तरीके से खाद बनाने के कारण , खेती के समय में सावधानी ना बरतने के कारण और कभी – कभी गलत बीज या किस्म के उपयोग के कारण भी आ सकती हैं।

इनको 5 भागों में बाँटा जा सकता है :
( 1. ) जीवाणु से होने वाले मशरूम रोग
( 2. ) प्रतियोगी फफूंदी से होने वाले मशरूम रोग
( 3. ) फफूंद से होने वाले मशरूम रोग
( 4. ) वीषाणु से होने वाले मशरूम रोग
( 5. ) अन्य कारणों से होने वाला मशरूम रोग

( 1. ) जीवाणु से होने वाले मशरूम रोग:

जीवाणु से होने वाले मशरूम रोग मुख्यतः 3 प्रकार के होते है:

1. ममी रोग
2. भूरा दाग या भूरा धब्बा
3. अदरक जैसा धब्बा

1. ममी रोग:

इस रोग में थैलों पर कुछ मशरूम की बढ़ोतरी बन्द हो जाती है और वह केसिगं मिट्टी पर ही चिपके रहते हैं ।

लक्षण-

मशरूम हल्के सलेटी रंग के हो जाते हैं और तना झुका होता है । तने का निचला हिस्सा कुछ मोटा होता है और ऐसे मशरूम को उखाड़ने पर काफी मिट्टी चिपक कर साथ आ जाती है ।

उपचार-

इस रोग से ग्रसित थैलों को जल्दी से जल्दी बाहर निकाल कर फेंक देना चाहिए । रोग ग्रस्त मशरूम को निकाल कर क्लोरिन वाले पानी ( ब्लीचिगं पाउडर 0.15 % ) का छिड़काव करें व कमरे के दरवाजे 1-2 घन्टे तक खुले रखें जिससे मशरूम के उपर का पानी सूख जाए । इन तरीकों को अपनाकर मशरूम रोग रोकथाम की जाती है ।

2. भूरा दाग या भूरा धब्बा:

भूरा दाग एक बहुत ही आम रोग है इस मशरूम रोग में मशरूम की टोपियों और तनों पर छोटे – छोटे भूरे धब्बे नजर आते हैं जो बाद में आकार में बढ़ जाते है ।

लक्षण-

मशरूम की टोपी चिपचिपी एवं मशरूम की कलिका भूरी हो जाती है तथा इनकी वृद्धि रूक जाती है । ऐसे में मशरूम रोग रोकथाम करना जरूरी हो जाता है ।

उपचार-

कमरे में तापमान 20 ° सेलसियस से ऊपर न जाए व कभी भी मशरूम इस तापमान पर तीन घन्टे से ज्यादा गीला न रहे । थैलों में नमी उचित रखें व अधिक न होने दें । रोग ग्रस्त मशरूम को निकाल कर क्लोरिन वाले पानी ( ब्लीचिगं पाउडर 0.15 % ) का छिड़काव करें व कमरे के दरवाजे 1-2 घन्टे तक खुले रखें जिससे मशरूम के उपर का पानी सूख जाए । इन तरीकों को अपनाकर मशरूम रोग रोकथाम की जाती है ।

3. अदरक जैसा धब्बा :

लक्षण-

इस रोग के लक्षण भूरा दाग रोग के समान ही है अन्तर केवल इतना ही है कि इसमें अदरक के रंग के 1-2 mm गहरे धब्ये दिखाई देते हैं जिनका रंग बाद तक नहीं बदलता है । ऐसे में मशरूम रोग रोकथाम करना जरूरी हो जाता है ।

उपचार-

थैलों में नमी उचित रखें व अधिक न होने दें । रोग ग्रस्त मशरूम को निकाल कर क्लोरिन वाले पानी ( ब्लीचिगं पाउडर 0.15 % ) का छिड़काव करें व कमरे के दरवाजे 1-2 घन्टे तक खुले रखें । इन तरीकों को अपनाकर मशरूम रोग रोकथाम की जाती है ।

( 2. ) प्रतियोगी फफूंदी से होने वाले मशरूम रोग :

प्रतियोगी फफूंदी खाद बनाते समय गलती के कारण आते है और इन्हें देखकर हम यह अंदाज़ा लगा सकते हैं कि कहाँ गलती हुई है । इसको हम 8 भागो में बांट सकते है है जैसे:

1. पीली फफूंदी
2. सफेद प्लास्टर
3. भूरी फफूंदी
4. सफेद फफूंदी
5. जैतूनी हरी फफूंदी
6. हरी फफूंदी
7. इन्की कैप्स
8. आभासी ट्रफल

1. पीली फफूंदी:

पीली फफूंदी कई तरह की फफूंद की प्रजातियों से होता है । कुछ एक प्रजातियां ऐसी होती है जो खाद में जिसमें नाइट्रोजन की मात्रा ज्यादा हो या मुर्गी की बीट ज्यादा हो या मुर्गी की बीट पुरानी डाली गई हो उसमें यह फफूंद काफी नुकसान पंहुचा सकती है और यह जब किसी माध्यम पर पनप जाता है तो इसे खत्म करना मुश्किल हो जाता है ।

लक्षण-

इस फफूंद से खाद या कम्पोस्ट पर पीले रंग के धब्बे बनते हैं या कई बार पीली भूरी फफूंद की परत बनती है , जो किनारों पर सफेद तथा उभरी हुई होती है । कई बार कम्पोस्ट और केसिंग मिट्टी के बीच में पीली – भूरे रंग की पट्टी सी बन जाती है । जब समस्या पीले धब्बों के रुप में आती है तो कई बार यह धब्बे मिल कर बड़े बन जाते हैं और सारी की सारी खाद पीले रंग की हो जाती है । कई बार खाद से सल्फर की दुर्गन्ध भी आती है । ऐसे में मशरूम रोग रोकथाम करना जरूरी हो जाता है ।

उपचार-

कम्पोस्ट में मुर्गी की बीट सही मात्रा में व ताजी डालें । कम्पोस्ट का पास्चुरीकरण सही ढंग से करें । उत्पादन कक्ष व उसके आस पास सफाई का विशेष ध्यान रखें । खाद पर कैल्शियम हाइपोक्लोराईड 0.15 %  घोल का छिड़काव किया जा सकता है । इन तरीकों को अपनाकर मशरूम रोग रोकथाम की जाती है ।

2. सफेद प्लास्टर :

सफेद प्लास्टर या सफेद परत खाद में सामान्यतः तब आती है जब कम्पोस्ट का पी.एच. 8.0 या इससे ज्यादा होता है । अन्य कारणों के अलावा खाद में अमोनिया की गन्ध की मौजुदगी से भी खाद का पीएच ज्यादा हो सकता है । ऐसे में मशरूम रोग रोकथाम करना जरूरी हो जाता है ।

लक्षण-

यह फफूंद केसिंग मिट्टी पर आटे की तरह दिखाई देता है , और अन्य प्रतियोगी फफूंद के विपरित अन्त तक सफेद ही बना रहता है । ऐसे में मशरूम रोग रोकथाम करना जरूरी हो जाता है ।

उपचार-

कम्पोस्ट में पी.एच. 7.0 से 7.5 के बीच में हो । बीजाई करते समय यह सुनिश्चित कर लें कि कम्पोस्ट में अमोनिया की गन्ध नहीं हो । कम्पोस्ट पर बैनोमिल 0.1 प्रतिशत का घोल या थिरम 0.05 प्रतिशत घोल का छिड़काव 10-10 दिन के अन्तर पर करें । इन तरीकों को अपनाकर मशरूम रोग रोकथाम की जाती है ।

3. भूरी फफूंदी :

भूरी फफूंदी की समस्या सामान्यतः बरसात के दिनों में देखी जाती है । यह खाद में ज्यादातर तभी आता है जब खाद ज्यादा गीला हो और मशरूम के कमरे में बीज फैलाव के दौरान ज्यादा तापमान हो । अगर खाद में जिप्सम की कमी हो तो भी यह समस्या खाद में आ सकती है । ऐसे में मशरूम रोग रोकथाम करना जरूरी हो जाता है ।

लक्षण –

बीजित कम्पोस्ट या केसिंग परत पर आटे की तरह सफेद गोल घेरे दिखाई देते हैं जो बाद में भूरे रंग के हो जाते है । इसका रंग बाद में लोहे के जंग की तरह हो जाता है , और पाऊडर में तबदील हो जाता है अगर इस पाऊडर को हाथ से मलकर देखें तो यह बारीक कणदार पाऊडर प्रतीत होता है । ऐसे में मशरूम रोग रोकथाम करना जरूरी हो जाता है ।

उपचार –

मशरूम कक्ष में व खाद बनाते समय साफ सफाई का विशेष ध्यान रखें । कम्पोस्ट में पर्याप्त मात्रा में जिप्सम मिलाना चाहिए व अधिक मात्रा में पानी न डाले । पीक हीटिंग से पहले कम्पोस्ट ज्यादा गीला न हो । जहां – जहां भूरे लेप के धब्बे आएं हो उन भागों को हटा कर उन जगहों पर फारमोलीन या 0.1 प्रतिशत मैनकोजेब का छिड़काव करें । इन तरीकों को अपनाकर मशरूम रोग रोकथाम की जाती है ।

4. सफेद फफूंदी :

लक्षण –

यह फफूंद कम्पोस्ट या केसिंग मिट्टी पर शुरू में सफेद फफूंद के रूप में आता है जो बाद में गुलाबी रंग का हो जाता है । ऐसे में मशरूम रोग रोकथाम करना जरूरी हो जाता है ।

उपचार-

इस फफूंद से बचने के लिए साफ सफाई का ध्यान रखा जाना चाहिए व कैप्टान 0.15 प्रतिशत घोल का छिड़काव 7-10 दिन के अन्तर पर करते रहें । इन तरीकों को अपनाकर मशरूम रोग रोकथाम की जाती है ।

5. जैतूनी हरी फफूंदी :

जैतूनी हरी फफूंदी खाद में अक्सर तब आता है जब पीक हिटीगं के बाद खाद में आक्सीजन की कमी रही हो या पीक हिटीग के समय खाद का तापमान 65 ° सैल्सियस से ऊपर चला जाए। 

लक्षण –

जैतूनी हरी फफूंदी ग्रसित कम्पोस्ट में बीजाई के एक दम बाद मशरूम जालों के फैलने का आभास होता है लेकिन यह जाला जल्दी ही खत्म हो जाता है , और इन जगहों पर खाद काली नजर आती है । ध्यान से खाद को देखने पर पता चलता है कि कम्पोस्ट के ऊपर छोटे – छोटे जैतुनी रंग के दाने है । ऐसे में मशरूम रोग रोकथाम करना जरूरी हो जाता है ।

उपचार-

खाद सही समय तक गलनी चाहिए । खाद को पास्चुराइजेशन चैम्बर में भरते समय कम्पोस्ट में कोई खाद या मुर्गी की बीट वगैरह नही डालनी चाहिए । ध्यान रहे कि पास्चुरीकरण के समय कभी भी खाद का तापमान 60 ° सैल्सियस से ज्यादा न जाये । इन तरीकों को अपनाकर मशरूम रोग रोकथाम की जाती है ।

6. हरी फफूंदी :

 

हरी-फफूंदी

हरी-फफूंदी
हरी फफूंदी

हरी फफूंदी एक बहुत ही सामान्य प्रतियोगी फफूंद है जो किसी भी मशरूम भवन में आ सकती है। इसके खाद में आने के कई कारण हो सकते हैं लेकिन मुख्यतः यह खाद में पी.एच. कम होने की वजह से आ सकता है । खाद अगर अच्छी तरह न गली हो तो भी यह प्रतियोगी आ जाता है । यदि बीज फैलते समय तापमान ज्यादा हो तो भी यह समस्या आ सकती है । यदि बीज कच्चा हो तो भी बीज के दानों पर हरी फफूंद आ जाता है ।

लक्षण –

कम्पोस्ट व केसिंग मिट्टी पर छोटे – छोटे हरे धब्बे दिखाई देते हैं । यह कभी – कभी मशरूम पर भी उत्पन्न होते हैं जिससे मशरूम भूरा हो जाता है और उस पर हरी फफूंद उगने लगती है । इस फफूंद के हरे रंग के लाखों स्पोरस बनते हैं जो आसानी से हवा में फैल जाते हैं । इन बीजाणुओं से मशरूम कक्ष में काम करने वालों के गले में एलर्जी भी हो जाती है । ऐसे में मशरूम रोग रोकथाम करना जरूरी हो जाता है ।

उपचार – 

कम्पोस्ट का सही ढंग से पास्चुरीकरण करें व सफाई का विशेष ध्यान रखें । मरे हुए मशरूम को निकाल कर फेंक दे । जहां – जहां हरे धब्बे आएं तो उन्हें निकाल कर 0.1 प्रतिशत कवच के घोल का छिडकाव करें । इन तरीकों को अपनाकर मशरूम रोग रोकथाम की जाती है ।

7. इन्की कैप्स :

लक्षण –

कई बार खाद में बिजाई करते समय तक कम्पोस्ट में अमोनिया की गन्ध रह जाती है या खाद कई बार ज्यादा गल जाए या फिर खाद में नाईट्रोजन की मात्रा ज्यादा हो तो ऐसी स्थिति में खाद में मशरूम जैसी जिनकी टोपी छोटी सी भूरे व काले रंग की होती है व तना लम्बा सफेद रंग का होता है , निकलना शुरू हो जाते हैं। ऐसे में मशरूम रोग रोकथाम करना जरूरी हो जाता है ।

जब कभी यह थैलों के बीच में निकल रहे हो तो इनका तना काफी लम्बा हो जाता है । 3-4 दिन में इस मशरूम की टोपी सड़ जाती है और काली सी स्याही में तबदील हो जाती है , इसलिए इन्हे इन्की कैप्स के नाम से जाना जाता है ।

उपचार –

बिजाई करने से पहले यह सुनिश्चित कर ले कि कम्पोस्ट में अमोनिया की गन्ध न हो । खाद को ज्यादा नही गलने दें व इसमें नाईट्रोजन की मात्रा ज्यादा न हो । जैसे ही इन्की कैप्स मशरूम खाद में दिखें इन्हे निकाल कर दूर फेंक दें । इन तरीकों को अपनाकर मशरूम रोग रोकथाम की जाती है ।

8. आभासी ट्रफल :

यह फफूंद फरवरी या मार्च के महीनों में जब तापमान बढ़ना शुरू होता है तब श्वेत बटन मशरूम में आता है। यह समस्या दूसरे गर्मी में लगने वाले बटन मशरूम में काफी गम्भीर होती है ।

यह माना जाता है कि जैसे ही स्पान रन के वक्त तापमान 25 ° सेलसियस से ऊपर जाए तो आभासी ट्रफल के आने का अन्देशा हो जाता है।

लक्षण –

शुरू में आभासी ट्रफल कम्पोस्ट पर गहरा सफेद फफूंद के रूप में दिखाई देता है जो जल्दी ही इन जगहों पर सफेद दानेदार गुच्छों के रूप में नजर आने लगता है ।

यह गुच्छे केसिंग मिट्टी पर भी आते हैं और अखरोट की गीरी के समान प्रतीत होते है । कुछ समय बाद यह हल्के भूरे रंग में तबदील हो जाते हैं और धीरे – धीरे बाद में पाऊडर के रूप में बदल जाते हैं । ऐसे में मशरूम रोग रोकथाम करना जरूरी हो जाता है ।

उपचार –

आभासी ट्रफल से बचने के लिए उत्पादन कक्ष का तापमान बीज फैलाव के समय 25 ° सैल्सियस व फसल के समय 20 ° सैल्सियस से अधिक न होने दें ।सफाई का ध्यान रखें । जिन थैलों में ट्रफल दिखाई दें उन्हे दूर फेंक दें । इन तरीकों को अपनाकर मशरूम रोग रोकथाम की जाती है । 

( 3. ) फफूंद से होने वाले मशरूम रोग :

फफूंद से होने वाले रोग 3 प्रकार के होते है :

1. जाली वाला रोग
2. गीला बुलबुला 
3. सूखा बुलबूला 

1. जाली वाला रोग :

जाली रोग , भारतवर्ष में 1977 में शिमला और सोलन की कुछ मशरूम इकाईयों में दर्ज किया गया । यह रोग बरसात के दिनों में ज्यादा देखा गया है ।

लक्षण –

इस रोग में केसिंग मिट्टी की सतह पर सफेद – सलेटी रंग का कवक आता है जो बाद में लाल रंग का हो जाता है । यह फफूंद छोटे – छोटे मशरूम के ऊपर जो इसके नजदीक पैदा हो रहे होते है उन्हें ढक लेता है और उन पर जाला सा बना देता है । जाले के नीचे आने वाले मशरूम सड़ जाते हैं और बाद में जाला केसिंग मिट्टी पर आ जाता है तथा इसका रंग बदल कर लाल हो जाता है। ऐसे में मशरूम रोग रोकथाम करना जरूरी हो जाता है ।

उपचार –

यह रोग ज्यादा तापमान व ज्यादा नमी पर बड़ी तेजी से फैलता है इसलिए कमरे में सही नमी रहनी चाहिए । उत्पादन कक्ष में डाइथेन एम -45 का 0.15 प्रतिशत घोल या स्पोरोगोंन 0.1 प्रतिशत घोल का छिड़काव करने से इस बीमारी को रोका जा सकता है । डाइथेन एम 45 ( 0.1 प्रतिशत ) या पैराक्लोरोनाइट्रोयेन्जीन 20 प्रतिशत या कैलशियम हाइपोक्लोराईट का 70 प्रतिशत घोल , रोग ग्रसित हिस्सों में भी लगाया जा सकता है । इन तरीकों को अपनाकर मशरूम रोग रोकथाम की जाती है ।

2. गीला बुलबुला :

गीला बुलबुला रोग भारतवर्ष में 1979 वर्ष में दर्ज किया गया । लगभग 1997 तक यह रोग लगभग शून्य के बराबर ही रहा लेकिन अचानक 1998 में हिमाचल के केन्द्रो पर भयानक रूप धारण कर लिया । अगले 2-3 वर्षों में उत्तरी भारत में बाकी राज्यों में भी यह बीमारी फैल गई। 

लक्षण-

गीला बुलबुला , जैसा कि नाम से ही प्रतीत हो रहा है इस रोग से मशरूम कुछ इस तरह से विकृत होता है कि वह पानी में बनने वाले बुलबुले की तरह हो जाता है । मशरूम विकृत हो जाते हैं और तना सूजा हुआ लगता है ।

मशरूम के उत्तकों में सडन शुरू हो जाती है और इनके उपर रूईदार फफूंद नजर आता है । अगले 1-2 दिन में यह विकृत मशरूम हल्के भूरे या गहरे भूरे रंग के हो जाते हैं । इन सड़े हुए मशरूम से भूरे रंग का द्रव्य निकलता है ।

गीला बुलबुला रोग के रोगाणु सामान्यतः केसिंग मिट्टी के द्वारा मशरूम कक्ष में थैलों के उपर आता है । ये रोगाणु जल्दी ही वहां ऊग जाते हैं और जैसे छोटे – छोटे उगते हुए मशरूम इनके सम्पर्क में आते है उन्हें यह रोग ग्रस्त कर देते है , और विकृत कर देते है ऐसे मैं मशरूम रोग रोकथाम करना जरूरी हो जाता है। मशरूम रोग रोकथाम मैं  सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है ।

उपचार-

केसिंग मिट्टी अच्छी तरह से रोगाणुमुक्त की जानी चाहिए । भाप से किटाणुमुक्त करने के बाद केसिगं मिट्टी पर 0.5 प्रतिशत फोर्मलीन के घोल का छिड़काव कर लेना चाहिए और इसके तुरन्त बाद मिट्टी को प्रयोग कर लेना चाहिए ।

केसिंग मिट्टी डालने से पहले कवच 0.1 प्रतिशत घोल का छिड़काव थैलियों पर कर लेना चाहिए। सपोरटेक या कवच का 7-10 दिन के अन्तराल पर 2-3 छिडकाव करने चाहिए ।

जैसे ही कभी कोई भी विकृत मशरूम नजर जाए उसे तुरन्त उखाड़ कर 2 %  फोर्मलीन के घोल में डुबो कर दूर फेंक देना या जमीन में दबा देना चाहिए । मशरूम भवन में मक्खियों का उपचार भी करते रहना चाहिए । इन तरीकों को अपनाकर मशरूम रोग रोकथाम की जाती है ।

3. सूखा बुलबूला :

यह बीमारी भारतवर्ष में 1974 में शिमला के आसपास चेल व तारादेवी क्षेत्रों से दर्ज की गई थी और जैसे – जैसे मशरूम का विकास दूसरे क्षेत्रों में हुआ यह बीमारी भारत के दूसरे राज्यों में भी दर्ज हुई ।

लक्षण –

इस बीमारी में शुरू में , सफेद फफूंद को रेसे केसिंग मिट्टी के उपर आते है और बीमारी अगर जल्दी आई हुई हो तो प्याज की तरह मशरूम की आकृति बन जाती है ।

मशरूम की टोपी पर छोटे – छोटे भूरे चब्बे दिखाई देते है जो बाद में कई धब्बे मिलकर बड़े भूरे धब्बों में बदल जाते हैं । ये धब्बे बीच से धसे होते हैं और एक पाऊडर सा दिखता है ।

तना बीच से फटने लगता है और कई बार तने से छिलके से निकलने लगते है । टोपी की आकृति भी बिगड़ जाती है और यह एक ओर को झुक जाती है । ऐसे में मशरूम रोग रोकथाम करना जरूरी हो जाता है ।

उपचार –

सूखा बुलबुला ज्यादातर केसिंग मिट्टी द्वारा ही किसी मशरूम इकाई या कमरे में आता है , इसलिए केसिंग मिट्टी सही ढंग से कीटाणुमुक्त की जानी चाहिए ।

सफाई का मशरूम केन्द्र में विशेष ध्यान रखें । इस बीमारी का डाइथेन एम -45 ( 0.2 प्रतिशत ) के घोल का छिड़काव करके उपचार किया जा सकता है ।

इस बीमारी के रोगाणु हाथों से चिपक जाते हैं और दूसरी थैलियों पर बीमारी फैल जाती है । इसलिए विशेष सावधानी बरती जानी चाहिए । मशरूम की मक्खियां भी इस बीमारी को फैलाती है इसलिए उनका भी उपचार किया जाना चाहिए । इन तरीकों को अपनाकर मशरूम रोग रोकथाम की जाती है ।

( 4. ) वीषाणु से होने वाले मशरूम रोग :

विषाणु जनित रोग लगने पर मशरूम घने गुच्छों में निकलते हैं तथा पहले चक्र में मशरूम कलिकाएं देर से बनती हैं । कई मशरूम कलिकाएं केसिंग परत के अन्दर ही बन जाती है ।

मशरूम का रंग भी मटमैला हो जाता है और जल्दी ही खुल जाता है । मशरूम लम्बे होते हैं तथा कमान की तरह मुड़ जाते हैं । मशरूम हल्के से केसिंग मिट्टी पर चिपके होते हैं और हल्की सी हवा से ही गिर जाते है ।

उपचार –

मशरूम का बीज सही होना चाहिए और यह भरोसेमन्द प्रयोगशाला से ही खरीदा जाना चाहिए । मशरूम टोपी खुलने से पहले ही तोड़ लेने चाहिए । फसल समाप्त होने के बाद उत्पादन कक्ष को 12 घन्टो तक 70 ° सैल्सियस तापमान पर रखे और इसके बाद कम्पोस्ट को बाहर निकाल कर दूर गड्डों में डाल दें । इन तरीकों को अपनाकर मशरूम रोग रोकथाम की जाती है ।

( 5. ) अन्य कारणों से होने वाला रोग :

कभी – कभी मशरूम में बिमारी जैसे लक्ष्ण वातावरण के गलत नियंत्रण के कारण भी आ जाते हैं जैसेः
1. टोपी पर पपड़ी बनना या मशरूम का हल्का होना
2.  मशरूम की टोपी का खुलना
3. मशरूम का टेढ़ा-मेढ़ा रूप धारण करना

1. टोपी पर पपड़ी बनना या मशरूम का हल्का होना :

टोपी पर पपड़ी बनना या मशरूम का हल्का होना यह दर्शाता है कि मशरूम कक्ष में हवा में नमी की कमी है और हवा की गति भी तेज है । आद्रता बार – बार कम ज्यादा होने से मशरूम की ऊपरी सतह फटनी शुरू हो सकती है ।

2.  मशरूम की टोपी का खुलना :

बटन मशरूम उत्पादन के दौरान मशरूम कक्ष में हवा का आगमन न होने से या कम होने से मशरूम का तना लम्बा व टोपी खुल जाती है। इसी तरह ढींगरी मशरूम में मशरूम के पत्ते का अन्दर की ओर सिमटना भी कम हवा का लक्षण है ।

3. मशरूम का टेढ़ा-मेढ़ा रूप धारण करना :

मशरूम में भी वातावरण प्रदुषण का प्रभाव पड़ता है । विशेष तौर पर बटन मशरूम की टोपी का उल्टा हो जाना , टोपी का फट जाना इत्यादि । मशरूम कक्ष में आटोमोबाइल का धुंआ , पानी में डीजल का मिलना व कम्पोस्ट में ग्रीस , तेल इत्यादि के मिलने से मशरूम विकृत पैदा होते हैं । 

निष्कर्ष :

मशरूम उत्पादन में सफाई का बहुत ही महत्व है । इसलिये शुरु से अन्त तक हर कदम पर इस बात का विशेष ध्यान रखा जाये कि मशरूम भवन या मशरूम उत्पादन में प्रयोग होने वाले सामान के चयन से लेकर , मशरूम उत्पादन की विधि और फसल उगाते समय प्रत्येक सावधानी बरती जाये ताकि कोई भी समस्या जन्म ही न ले सके अन्यथा बाद में किसी समस्या का निवारण करना उतना ही मुश्किल हो जायेगा ।

मशरूम की खेती की ट्रेनिंग :

भारत मैं मशरुम की खेती का प्रशिक्षण बागवानी विभाग से ले सकते है इसकी वेबसाइट https://hortnet.gov.in/ है।

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I was born into a farmer's family in a village near Banaras. I completed my studies in mechanical engineering and I am the first engineer in my village. Since childhood, I have been more attracted to nature and wanted to do something that would keep me connected to farms and farmers. I love to do research and collect the latest information about agriculture, horticulture and then I write articles about them. If my farmer brothers benefit even a little from the articles I write, I will consider myself very lucky.

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