बटन मशरूम की खेती :

बटन मशरुम उगने की प्रक्रिया, इसके लिए खाद बनाने की प्रक्रिया से सुरु हो जाती है। खाद बनाने के बाद आगे की प्रक्रिया को हम इस प्रकार समझ सकते है :-


( 1 ) खाद में बीज डालना ( स्पानिंग )

( 2 ) स्पान रन अर्थात बीज को खाद में फैलने के लिए कमरों में रखना

( 3 ) केसिंग अर्थात स्पान रन के बाद इसके ऊपर एक खास किस्म की मिट्टी कि तह बिछाना

( 4 ) मशरूम उतपादन के लिए वातावरण नियंत्रण करना 

( 5 )  मशरूम की तुड़ाई

( 6 )  पैदावार

 

( 1 ) खाद में बीज डालना ( स्पानिंग )  

बटन-मशरूम-की-खेती

मशरूम के बीज को खाद में मिलाने की प्रक्रिया को बीजाई या स्पॉनिंग कहते हैं । स्पॉनिंग की प्रक्रिया को जानने से पहले हम अच्छी क्वालिटी के बीज की खासियत के बारे में जान ले:

स्पान (बीज) की खासियत:

मशरूम उत्पादन में प्रयोग में लाया जाने वाला बीज शुद्ध होना चाहिए ।  मशरूम के बीज में पीले , हरे , भूरे , गुलाबी , नीले आदि रंग के फफूंद नहीं होने चाहिए साथ ही बीज में किसी प्रकार के जीवाणु और अवांछित बू भी नहीं होनी चाहिए ।

बीज को मिलाने की प्रक्रिया:

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यह क्रिया आम तौर पर कम्पोस्ट टनल के साथ लगे हुए एरिया में की जाती है । यह एरिया साफ सुथरा , पक्का और ढका हुआ होता है । जो किसान लम्बी विधि से खाद बनाते हैं और झोपडीयों में खेती करते हैं वे खाद को शेल्फों में भरने के बाद शैल्फों के ऊपर ही बीज मिलाते हैं ।

कुछ किसान बीज मिली खाद ही खरीदते हैं और उनको यह क्रिया करने की जरूरत नहीं पड़ती ।
बीज को खाद के ऊपर छिड़क कर अच्छी तरह हल्के हाथों से मिलाया जा सकता है ।

इस को परत के रूप में 3-4 परतों में डाला जा सकता है और कभी कभी ऐसी खाद जिसमें बीज पूरी तरह फैला हो , उसको भी बीज के रूप में उपयोग किया जा सकता है । इन क्रियाओं का विवरण नीचे दिया जा रहा है:

थोरो स्पोंनिंग  ( सम्पूर्ण बीजाई ) :

इस विधि में बीज को पॉलीथीन बैग या सैल्फ में खाद भरते समय अच्छे प्रकार से मिला दिया जाता है । बीजाई की विधि कोई भी हो बीज की मात्रा 0.5 प्रतिशत से 0.75 प्रतिशत तक रखी जाती है ।

एक क्विटल खाद में 500-750 ग्राम बीज पर्याप्त होता है। बीज को खाद की ऊपरी परत में मिलाते हुए यह ध्यान रखना चाहिए कि बीज खाद से अच्छे प्रकार से ढक जाये अन्यथा इस बीज पर अवांछित फफूंद उग सकते हैं ।

लेयर स्पानिंगः

इस विधि जिसे परत बिजाई के नाम से भी जाना जाता है । इसमें मशरूम बीज को खाद में दो – तीन परत में छिडका जाता है । पहली परत 2-3 इंच खाद डालने पर व दूसरी परत फिर से 2-3 इंच खाद डालने पर छिडक देते हैं।

सुपर स्पानिंगः

इस विधि में उस खाद को बीज के रूप में प्रयोग किया जाता है जिसमें फफूंद भली प्रकार फैल चुका हो । ऐसा माना जाता है कि फफूंद एक माध्यम से एक प्रकार का एन्जाईम सिस्टम रखता है और माध्यम बदलने पर यह एक एन्जाईम सिस्टम भी बदलता है ।

इसलिये माध्यम बदलने से फफूंद की प्रारंभिक उन्नति बहुत ही धीरे होती है । जब मशरूम की खाद को ही बीज के रूप में प्रयोग में लाया जाए तो यह बीज अनाज वाले बीज की अपेक्षा अधिक तेजी से फैलता है क्योंकि माध्यम वही रहता है ।

परन्तु इसमें ध्यान में रखने योग्य बात यह है कि बीज के लिये उपयोग में लाई जाने वाली खाद में प्रतियोगी फफूंद उपस्थित नहीं होने चाहिए । साथ ही यह बहुत अधिक पुराना भी नहीं होना चाहिए । बटन मशरूम उत्पादन के लिए थोरो विधि द्वारा बिजाई करना ही उचित होता है ।

खाद मैं बीजाई के समय ध्यान देने वाली बातें:

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(1.) खाद में पानी की मात्रा 60 से 67 प्रतिशत तक होनी चाहिए । यदि पानी इससे अधिक हो तो खाद को बैग या पेटियों में भरते समय दबाना नहीं चाहिए अन्यथा आक्सीजन की कमी से स्पॉन मर जाएगा ।

(2.) खाद का पी.एच 7.0 से 7.8 तक होना चाहिए तथा अमोनिया की गंध बिल्कुल नहीं होनी चाहिए । अमोनिया की उपस्थिति खाद में फैल रहे बीज को मार देती है।

(3.) बीजाई के उपरांत इन शेल्फो तथा बैगों को जिस कमरे में रखना हो उस कमरे को पहले से ही अच्छी प्रकार से साफ करके फार्मेलीन का 2 प्रतिशत घोल बनाकर स्प्रे पम्प से अच्छी तरह स्प्रे करके कमरा बंद कर देते हैं ।

यह उपचार बीजाई से दो दिन पहले किया जाता है । इसी प्रकार यदि उपज के लिए शेल्फों का उपयोग किया जाना हो तो इन्हें भी फार्मेलीन के 2 प्रतिशत घोल से उपचारित करते है । बीजाई के लिये केवल उपचारित शेल्फों का ही प्रयोग करना चाहिए ।

बीजाई के उपरान्त ( यदि बैग उपयोग में लाए गए हों ) बैग का ऊपर की ओर बचा खाली हिस्सा अन्दर की ओर इस प्रकार मोड़ा जाता है कि यह खाद को पूरी तरह से ढक लें और साथ ही यह इतना अधिक कसकर नहीं बंधा होना चाहिए कि बीज को फैलने के लिए आवश्यक ऑक्सीजन ही न मिले ।

यदि बैग को अन्दर की ओर मोड़ने की गुंजाइश न हो तो बैग के ऊपरी हिस्से को पॉलीथीन अथवा कागज से ढक देते हैं । इसी प्रकार पेटी / शेल्फों में भी खाद की ऊपरी सतह को कागज से ढक देते हैं जिससे खाद में नमी बनी रहे । इसके पश्चात् इन बैगों या शेल्फों को निश्चित तापक्रम ( 22-25 ° C ) वाले कमरे में रख दिया जाता है ।

इन्हें यदि अखबारी कागज से ढका गया हो तो बीजाई के एक दम बाद 0.5 प्रतिशत फार्मेलीन का घोल बनाकर स्प्रे पम्प की सहायता से कागज पर छिड़का जाता है । इसके पश्चात् इन पेटियों तथा बैगों में ( यदि कागज बिछाया गया हो ) दिन में 2-3 बार स्प्रे पम्प की सहायता से पानी छिड़का जाता है ।

पानी इस प्रकार छिड़का जाना चाहिए कि बैग अथवा शेल्फों में पानी खड़ा न हो तथा साथ ही इन पर बिछे कागज न सूखें । कमरे में आवश्यकतानुसार नमी ( 80-85 प्रतिशत ) बनाए रखने के लिए दीवारों , दरवाजों पर बोरियाँ टांग कर इन्हें पानी डालकर गीला रखा जा सकता है।

यदि बैग पॉलीथीन शीट से ढके गए हों तो इन पर पानी की छिड़काव करने की आवश्यकता नहीं होती परन्तु नमी इसी प्रकार से बनी रहनी चाहिए । इस समय ताजी हवा की ज्यादा जरूरत नहीं होती ।

( 2 ) बिजाई के समय रख रखाव:

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खाद में स्पॉन फैलने के लिए तापमान 22-25 ° सेल्सियस ही रखना चाहिए । इस तापमान पर बीज 12-14 दिन में खाद में पूरी तरह से फैल जाता है । यदि तापमान इससे कम हो तो बीज को फैलने में अधिक समय लगता है ।

इस समय यह आवश्यक हो जाता है कि हीटर आदि लगाकर तापमान 25 ° सेल्सियस तक ले जाया जाए । यह तापमान खाद का है और कमरे का तापमान आमतौर पर 1-2 कम हो सकता है । कमरे को गर्म करने के लिए बिजली चालित उपकरणों का प्रयोग करना चाहिए ।

लकड़ी , कोयला अथवा मिट्टी के तेल के उपयोग से धुंआ उत्पन्न होता है जिससे विकृत मशरूम निकलने का डर रहता है । यदि तापमान 25 ° सेल्सियस से अधिक हो तो भी मशरूम के बीज के लिए अच्छा नहीं होता और कई प्रकार की बीमारियां व प्रतियोगी फफूंद उगने शुरु हो जाते हैं जो मशरूम के बीज को फैलने से रोकते हैं ।

तापमान कम करने के लिये ताजी हवा अथवा कूलर या एअर कंडीशनर का उपयोग किया जा सकता है । नमी व तापमान के अतिरिक्त , कमरे में हवा के आवागमन की सुविधा भी आवश्यक है जिससे कमरे में निश्चित आक्सीजन की मात्रा बनी रहे । बीज ( स्पॉन ) फैलने के लिए थोड़ी अधिक कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा की आवश्यकता होती है।

(3) कैसिंग करने के समय रख रखाव:

कैसिंग मिट्टी को बनाने का तरीका, अच्छी कैसिंग मिट्टी के गुड तथा कैसिंग मिट्टी को बिछाने का तरीका जानने के लिए ये आर्टिकल पढ़े: बटन मशरुम की केसिंग मिट्टी को बनाने की Best तकनीत

(4) केसिंग के बाद फसल की देखभाल :

केसिंग प्रक्रिया पूर्ण करने के बाद , केसिंग में माईसिलियम को फैलने दिया जाता है । इसके लिये कमरे का तापमान 22-25 ° सेल्सियस रखा जाता है । केसिंग की परत एक कम्बल की तरह काम करती है और खाद में उत्पादित उष्मा को बाहर निकलने से रोकती है ।

इस कारण से बैगों व शेल्फों का तापमान 25 ° सेल्सियस से अधिक हो जाता है , विशेषतः जब नाइट्रोजन युक्त सम्पूरक प्रयोग में लाया जाये । केसिंग करने के लगभग एक सप्ताह पश्चात , जब फफूंद केसिंग में फैल चुका हो तो कमरे का तापमान 16-18 ° सेल्सियस करके और कार्बन डाई – ऑक्साइड की मात्रा 1000 से 1500 पीपीएम ( पार्ट पर मिलियन ) अर्थात 0.1 से 0.15 प्रतिशत की जाती है जिस के लिए कमरे में ताजा हवा देनी जरूरी होती है ।

मशरूम उत्पादन इसी तापमान से शुरु होता है इससे अधिक तापमान होने पर उपज कम होती है और जितना अधिक तापमान होगा उत्पादन में उतनी अधिक कमी होगी । 21 ° सेल्सियस से अधिक तापमान पर कुल अपेक्षित उत्पादन का 50 प्रतिशत ही उत्पादन हो पाता है । तापमान 25 ° सेल्सियस से अधिक होने पर उत्पादन बिल्कुल बन्द भी हो सकता है ।

केसिग की तह मशरूम के विकास के लिये आवश्यक जल उपलब्ध कराती है । साथ ही यह खाद को सूखने से रोकती है । मशरूम पैदावार के समय कमरे में भी लगभग 80-90 प्रतिशत नमी की आवश्यकता होती है । इतनी नमी को बनाए रखने के लिये फर्श को गीला रखें , दीवारों पर बोरियां टांग कर उन पर भी पानी का छिड़काव किया जा सकता है ।

केसिंग तह पर साफ पानी का छिड़काव करें । छिड़काव इस प्रकार करना चाहिए कि केसिंग के ऊपर पानी खड़ा न हो और न ही केसिंग की परत सूखने पाए । साधारणतया दिन में दो बार छिड़काव ( एक सुबह व एक शाम ) काफी होता है ।

परन्तु यदि वातावरण में नमी बहुत कम हो या तापमान बहुत अधिक हो तो दो से अधिक छिड़काव भी किए जा सकते हैं । छिड़काव करते समय स्प्रेयर ( स्प्रे पम्प ) का नोजल इस प्रकार रखना चाहिए कि पानी मिस्ट की तरह पड़े , नहीं तो मशरूम को चोट पहुंचने का खतरा बना रहता है ।

ताजी हवा का आवागमन :

खाद में माईसिलियम फैलते समय कार्बन डाईऑक्साइड की बहुतायत मशरूम के लिये लाभकारी होती है । इसलिये दिन में एक या दो बार शुद्ध हवा देना काफी होता है ।

परन्तु मशरूम उत्पादन के समय शुद्ध हवा की आवश्यकता बढ़ जाती है , इस दौरान कमरे में कार्बन डाईआक्साइड की मात्रा 0.1 से 0.15 प्रतिशत तक होनी चाहिए । इसके लिये ताजी हवा फेंकने वाले पंखे कमरे में लगाए जा सकते हैं ।

हवा सीधी बैड के ऊपर न पड़े , इसके लिये डक्टस ( हवा वाहिनी ) का प्रयोग किया जा सकता है । इस डक्ट का एक सिरा पंखे के मुंह पर लगा दिया जाता है तथा दूसरा सिरा कमरे के दूसरी ओर लगा कर बन्द कर दिया जाता है । इस डक्ट में नीचे की और थोड़ी – थोड़ी दूर ( 50 cm ) पर लगभग 2 इंच चौडे छिद्र किये जाते हैं ।

इस डक्ट को कमरे की छत की तरफ इस प्रकार लटकाया जाता है आते जाते ये बाधा न पैदा करे। जब फसल उत्पादन के समय पानी का छिड़काव करना हो तो यह ध्यान रखना चाहिए कि मशरूम तोड़ने के पश्चात् ही पानी का छिड़काव करें । यदि छिड़काव पहले करेंगे तो मशरूम मिट्टी से लथ – पथ हो जाएंगे जिससे इनकी गुणवत्ता में कमी आती है ।

( 5 ) मशरूम की तुड़ाई :

मशरूम-की-तुड़ाई

मशरूम की टोपी का आकार जब 3-4 सेमी हो जाए तो यह तोड़ने योग्य हो जाती है । इस अवस्था में मशरूम के गलफडे ( गिल्स ) एक झिल्ली से ढके रहते हैं ।

यदि इस अवस्था में मशरूम न तोड़ा जाए तो यह झिल्ली फट जाती है और मशरूम धीरे – धीरे छतरी का आकार ले लेती है । खुली हुई छतरीनुमा मशरूम का विपणन मुश्किल हो जाता है तथा उचित मूल्य भी नहीं मिल पाता । परिपक्व मशरूम की तुड़ाई अंगूठे व पहली उँगली के बीच पकड़कर हल्का घुमा कर की जाती है, फिर धीरे से मशरूम को बाहर की तरफ खींच लेते हैं ।

मशरूम के तने का निचला सिरा जिसमें मशरूम फफूंद धागों के रूप में लटका रहता है तथा मिट्टी के कण चिपके रहते हैं , तेज चाकू से काट कर अलग कर लिया जाता है । ऊपर का टोपी वाला हिस्सा लगा हुआ साफ तना खाने के काम आता है । मशरूम की तुड़ाई से उत्पन्न हुए छिद्रों को केसिंग मिश्रण से भर दिया जाता है और इसके पश्चात् ही पानी का छिड़काव किया जाता है ।

मशरूम की तुड़ाई प्रतिदिन होती है । छोटे पिनहेड्स ( नवजात मशरूम कलिकाए ) आगे कुछ दिनों में बड़े होकर तुडाई के योग्य हो जाते हैं । यह तब तक चलता है जब तक एक फसल अवस्था समापन अर्थात फ्लश ब्रेक न आ जाए ।

इस अवस्था में बैड पर न तो बटन और न ही पिनहेडस दिखाई देते हैं यह अवस्था 3-4 दिन तक रहती है जिसके पश्चात् मशरूम पुनः निकलना शुरु हो जाते है । यह चक्र 4-5 सप्ताह तक ए.सी. युनिट में चलता रहता है व मौसमी खेती में 8-10 सप्ताह तक चलता रहता है ।

( 6 ) पैदावार:

भारतवर्ष में मशरूम की पैदावार में बहुत विभिन्नता है क्योंकि यहां पर काफी मशरूम प्राकृतिक वातावरण में उगाई जाती है । जब तक मशरूम को नियन्त्रित वातावरण में न लगाया जाए इसकी निश्चित पैदावार नहीं ले सकते । यहां पर कही – कही खाद भी लम्बी अवधि वाली विधि के द्वारा बनाई जाती है जिसमें अपेक्षाकृत कम पैदावार मिलती है ।

परन्तु फिर भी यदि खाद व बीज ठीक बने हैं और फसल लेने के दौरान सफाई आदि का पूरा ध्यान रखा जाए तो लम्बी अवधि वाली खाद से 3-4 पलश ( lush ) में लगभग 10 से 15 किलोग्राम मशरूम प्रति क्विटल खाद से प्राप्त हो सकते हैं । यदि खाद लघु अवधि वाली विधि से बनाकर मशरूम A/C Unit में उगाई जाए तो 15-20 किलो/ क्विंटल मशरुम प्राप्त कर सकते है।

मशरूम की खेती की ट्रेनिंग :

भारत मैं मशरुम की खेती का प्रशिक्षण बागवानी विभाग से ले सकते है इसकी वेबसाइट https://hortnet.gov.in/ है।

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SUNIL YADAV
I was born into a farmer's family in a village near Banaras. I completed my studies in mechanical engineering and I am the first engineer in my village. Since childhood, I have been more attracted to nature and wanted to do something that would keep me connected to farms and farmers. I love to do research and collect the latest information about agriculture, horticulture and then I write articles about them. If my farmer brothers benefit even a little from the articles I write, I will consider myself very lucky.

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